वातावरण एवं अनुष्ठान |

वातावरण एवं अनुष्ठान |

वातावरण एवं अनुष्ठान |

मैंने विभिन्न कामोद्दीपक नुस्खों तथा अन्य कारकों का विवरण दे दिया है जो काम-क्षमता तथा काम-वासना आदि में वृद्धि करते हैं ।

दो और कारक हैं जो काम-अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । ये हैं वातावरण व शयन-कक्ष की सज्जा तथा अनुष्ठानों का महत्त्व ।

सहवास के लिए उपयुक्त वातावरण होना चाहिए जो इन्द्रियों को स्पंदित करे तथा उनमें उत्तेजना भर दे ।

यह हुआ बाहा वातावरण । इसी प्रकार आंतरिक तैयारी जिसमें मस्तिष्क ठीक से सक्रिय हो (आंतरिक वातावरण) ।

यह भी उत्तना ही महत्त्वपूर्ण है । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए निम्न सुझाव अनुकरणीय हैं :

शयन-कक्ष हवादार तथा सुरुचिपूर्ण होना चाहिए । सर्दियों में इसे अत्यधिक गर्म तथा गर्मियों में अत्यधिक ठंडा न करें ।

सर्दियों में कमरे को गर्म करने की अपेक्षा कई कम्बल मिलाकर ओढ़ लेना ज्यादा हितकारी है। अधिक ठंडे कमरे, जिनमें हवा चल रही हो, भी अच्छे नहीं होते ।

इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सहवास-क्रिया वातवर्द्धक है तथा वायु, वेग और कम तापमान भी वातवर्द्धक है।

शयन-कक्ष जहाँ तक हो सके शांत स्थान पर होना चाहिए । कोई तीन सुगंधि कमरे में नहीं होनी चाहिए ।

चमेली की सुमधुर गंध, मोतिया अथवा हल्की सुगंधि वाली कोई जड़ी-बूटी या अगरबत्ती कक्ष में जलाई जा सकती है। ऐसा ही आयुर्वेदिक साहित्य में भी बताया गया है।

इसका उद्देश्य कमरे को सुगंधित करना ही नहीं अपितु कमरे की वायु को शुद्ध करना भी है।कमरे में बहुत-सी चीजें न हों ।

दीवारें अच्छी तरह सफ़ेद की हुई साफ-सुथरी होनी चाहिए । कमरे की सजावट आदि के लिए इस्तेमाल किए गये रंग अधिक चटख तथा भाँति-भाँति के नहीं होने चाहिए ।

बिस्तर ढीला नहीं होना चाहिए, बिलकुल समतल होना चाहिए । बिस्तर की चादरें सिंथेटिक पदार्थों की बनी न होकर सूती या रेशमी होनी चाहिए।

कमरे को ऐसी चीजों से सजाना चाहिए जो इन्द्रियों को आनंदित करें और उनकी प्रशंसा करने को जी करे,

जैसे कुछ सुन्दर चित्रकारी, गलीचे तथा अन्य हस्तशिल्प की वस्तुएँ । कमरे में पूरी तरह एकांत हो । खिड़कियाँ व दरवाजे परदों से ढके हों।

टेलीफोन, मशीन अदि कोई भी व्यवधान डालने वाली या ध्यान बँटाने वाली चीज कमरे में नहीं होनी चाहिए।

दिन की तमाम गतिविधियों को पूरी तरह भुलाकर पूरी निश्चितता के साथ, हर प्रकार की व्यस्तता व हड़बड़ी को मस्तिष्क से निकालते हुए रात की निस्तब्धता में निमग्न हो जाना चाहिए ।

अनेक आधुनिक दम्पति अपने शयन-कक्ष में टेलीविजन रखते हैं और जासूसी फिल्में या मैच देखने के बाद सहवास-क्रिया करना चाहते हैं ।

फिर वे शिकायत करते हैं कि अरे, हम तो कुछ भी नहीं कर पा रहे । फिर तलाक और मतभेद की नौबत आ जाती है ।

शयन-कक्ष में टेलीविजन कभी नहीं रखना चाहिए । बेहतर है कि शयन-कक्ष में प्रवेश करने से पहले दम्पति बाहर घूमने जाएँ |

बाहर फूल, वनस्पतियाँ, नदी, झील, झरने आदि देखें, चाँदनी रात में चंद्रमा को देखें । परस्पर वार्तालाप करें ।

कभी भी शयन कक्ष में जाने से पहले मतभेद वाली बातें, बहस या झगड़ा न करें । शांतिपूर्वक एक दूसरे में खोये रहकर ही यह स्थिति प्राप्त की जा सकती है ।

धीरे-धीरे बाहरी भीतरी वातावरण को इच्छा पैदा होने के अनुकूल बनायें । श्वास संबंधी व्यायाम (प्राणायाम) तथा शवासन साथ-साथ करें जिससे मस्तिष्क पूरी तरह शांत हो जाए ।

काम-ऊर्जा के पूर्ण एवं तीव्र प्रवाह के अनुकूल आंतरिक वातावरण तैयार करना आपके मूल व्यवहार पर निर्भर करता है ।

आपको यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि दूसरा व्यक्ति अर्थात् आपका साथी आपको सुख देता है । वह भोजन अथवा किसी अन्य वस्तु की तरह नहीं है

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जिसका आप आनंद ले सकें । वास्तविकता यह है कि आप स्वयं ही अपने लिए सुख की सृष्टि करते है। और फिर यह मत भूलिए कि सहवास का उद्देश्य केवल सुख प्राप्त करना ही नहीं है ।

यह दो ऊर्जाओं के एक-दूसरे से मिलने और एक-दूसरे में समा जाने की क्रिया है जिसमें गहन आनंद की अनुभूति होती है ।

अपने साथी से मिलन के समय आप हड़बड़ी और व्यस्तता भरे दृश्य जगत से ऊपर उठ जाते हैं । आनंद से भरपूर अनुभूति को समग्रता से ग्रहण करने के लिए यह आवश्यक है

कि आप एक-दूसरे के प्रति पूरा आदर-भाव रखें। यह अपने साथ के विचार, शरीर अथवा अन्य विशेषता का सम्मान करना नहीं है,

अपितु उसके समूचे अस्तित्व को पूरी तरह स्वीकार एवं सम्मानित करना है ।

अत: मिलन के समय एक-दूसरे के स्थूल शरीर, अंगों के सौंदर्य तथा आकर्षण तक ही सीमित नहीं रहना है अपितु उसके समूचे अस्तित्व की गहराई में उतरना है ।

यह समूचा अस्तित्व केवल भौतिक शरीर नहीं है, ऊर्जा की प्रतीक ज्योति को …..

अपने साथी में तथा अपने आपमें देखिए, फिर देखिए कि किस प्रकार दोनों ज्योतियाँ एक-दूसरे के निकट आती हैं और फिर एक-दूसरे में समा जाती हैं ।

जब वे एक-दूसरे में विलीन होंगी तो अत्यधिक तीव्र प्रकाश उपजेगा। यह मिलन ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रतीक है ।

विपरीत लिंगियों का यौन-समागम सनातन पुरुष (विश्वात्मा) के प्रकृति (ब्रह्मांडीय अस्तित्व) से मिलन का प्रतीक है। इस मिलन से ही समूचे ..

दृश्य जगत तथा हमारा पृथ्वी का अस्तित्व सम्भव हुआ है । इस प्रकार यौन-समागम सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है ।

यह एक पवित्र कार्य है, इसमें मालिन्य के लिए कोई स्थान नहीं । यह सब अनुभव करने के लिए आपको शारीरिक मिलन के माध्यम से आत्मिक मिलन के स्तर तक जाना होगा

तभी दोनों की आंतरिक ऊर्जाओं का एक-दूसरे में समा जाना सम्भव होगा ।

शारीरिक अथवा ऐन्द्रिक अनुभूति को पार करने के लिए गहन मिलन (देर तक समाये रहना) का अभ्यास करना होगा और यह तभी सम्भव है

जब आपकी काम-क्षमता व स्तम्भन शक्ति प्रबल हो । इस विषय का पहले वर्णन किया जा चुका है ।

अब केवल यह बताया जाना शेष है कि आप धीरे-धीरे विधिपूर्वक शारीरिक मिलन से उपजने वाली इन्द्रिय-अनुभूति से भी परे की गहन अनुभूति तक कैसे पहुँचें ।

इसके लिए सबसे पहले एक दूसरे के शरीर को खुलकर देखना, स्पर्श करना, समझना व अनुभव करना चाहिए ।

मिलन से पहले यदि दोनों साथी एक-दूसरे के समूचे शरीर पर चन्दन का लेप लगाएँ तो इस क्रिया के दौरान अंग-अंग तक खुलकर पहुँचने तथा उनके सौंदर्य का आनंद लेने का अवसर मिल जायेगा ।

मानव-शरीर की जटिलता और विराटता को समझने का अवसर भी मिलेगा। शरीर के अंग-अंग को निरखने और समझने के अन्य ढंग भी हो सकते हैं

जैसे सुगंधित और सुकोमल फूल से शरीर के हर अंग को छुआ जाए, हर अंग का धीरे-धीरे स्नेहन किया जाए अथवा बहुत बारीकी से हर अंग को केवल देखा जाए ।

पहले अपने शरीर को अच्छी तरह देखिए । उस पर पूरा ध्यान केन्द्रित कीजिए, फिर अपने साथी के शरीर को उसी तरह देखिए

इस आसन के साथ ही साथ आप अपने साथी का बहुत बारीकी से निरीक्षण कर सकते हैं ।

ऐसा करते समय आपका ध्यान साथी के अंगों की सुन्दरता एवं आकर्षण पर ही केन्द्रित रहना चाहिए,

काम-सुख की ओर ध्यान केन्द्रित न करें ऐसा करने के लिए अपने मन को बहुत साधना पड़ेगा।

यौन-समागम के विषय में हर समाज व देश की अपनी-अपनी मान्यताएं एवं परम्पराएं है।

भारतीय लोगों का विश्वास है कि ये सब बातें माता-पिता अथवा अन्य लोगों से सीखे बिना ही वयस्क होने के साथ-साथ सब अपने-आप जान जाते हैं

क्योंकि ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक रहस्यात्मक ढंग से अपने आप चलती रहती हैं (आधुनिक आनुवंशिकी इसकी गहराई तक नहीं पहुंच सकती) ।

कभी-कभी दादा के मुंह से दो साल के बच्चे को कुछ करते देखकर निकल जाता है- “अरे, यह तो बिलकुल उसी तरह कर रहा है जैसे इसका पिता करता था जब वह दो

साल का था।” आपने कई बार बच्चों को कुछ ऐसी क्रियाएँ करते देखा होगा जो उन्होंने किसी से नहीं सीखीं।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी बहने वाली सूक्ष्म ऊर्जा से मेरा तात्पर्य इसी रहस्यमय प्रवृत्ति से है जो हमें रति-क्रिया के क्षेत्र में आनुवंशिक रूप प्राप्त होती है।

इतना अवश्य है कि जीवन में कृत्रिमता अपनाने तथा ब्रह्मांडीय गति से सम्पर्क टूट जाने के कारण हम अब अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी खोते जा रहे हैं।

ऊपर दिया गया विवरण आपको इस दिशा में ले जाने में सहयोगी होगा और मन को एकाग्र करके इसके प्रकाश में आप यौन समागम के सही तरीकों और सहयोगी क्रियाओं के बारे में स्वयं जान लेंगे।

मैंने आधारभूत तथ्यों की व्याख्या कर दी है, अब इनके आधार पर मन की निर्विकल्पता प्राप्त करना

तथा मानसिक ऊर्जा को अंग-अंग में काम- ऊर्जा जागृत करने के लिए प्रयुक्त करना शेष है जो इस प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है।

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