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कफ-विकार से होती हैं अनेक परेशानियां और ये 16 हेल्थ प्रॉब्लम जरूर जानिए…
त्रिदोष के आधार पर ही शरीर की प्रकृति
तय की जाती है। तीन दोषों में से एक भी दोष विषम होने पर शरीर में अनेक रोगों का खतरा मंडराने लगता है।
कफ का कंट्रोल भी हानिकारक है...
बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा की कफ सन्तुलित होने से शरीर स्वस्थ्य रहता है। इसलिए कफ सम या सन्तुलित करें, कफ को सुखाना-मिटाना नहीं है। इस ब्लॉग में अच्छे स्वास्थ्य हेतु सिद्धान्त-सूत्रों का विस्तार से विवरण दिया जा रहा है। देह में कफ के असंतुलन से होती हैं तमाम समस्याएं और परेशानियां।
कफ से पीड़ित मरीजों को क्या-क्या सावधानी बरतना चाहिए…..
त्रिदोषों में एक कफ (Phlegm) रोग सूखा हो या गीला हो, इसके कारण ही देह में संक्रमण फैलता है। भविष्य में लोगों ने यदि रोगों का कारण
वात-पित्त कफ के संतुलन पर ध्यान नहीं दिया, तो सन्सार में अभी कोरोना वायरस जैसी महामारी और फैलेंगी। याद रखें हमें तीनों त्रिदोषों को मिटाना नहीं है-केवल सम यानि सन्तुलित करना है।
कफ बढ़ने से होते है 45 से ज्यादा रोग कफ-लाइफ को रफ, टफ बना देता है… इस ब्लॉग में जानेंगे की कफ की मात्रा कम या कमजोर होने से देह में अनेक विकार उत्पन्न होने लगते हैं। वात, पित्त, कफ की अधिकता या क्षय होने से इम्युनिटी क्षीण यानि रोगप्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। फिर….
चाहें कर लो लाख उपाय …..
शरीर सुधरता नहीं है। अब आने वाले वक्त में आयुर्वेद की अमृतम ओषधियाँ, वैदिक परम्पराएं, सात्विक भोजन, सयंमित सुख-सुविधाएं, सद्चरित्रता, एकान्त यानि क्वारेंटाईन, योग और योगेश्वर महादेव का ध्यान, भजन ही जीवन को पार लगा सकता हैं अतः स्वस्थ्य रहने और जीने के लिए आपको इस पर विश्वास करना ही पड़ेगा।
सर्दी-खांसी, जुकाम एवं ५ प्रकार का कफविकार ही कोरोना वायरस की वजह है-इस लेख में जाने- कफ-कोप का समय, कारण, लक्षण, कफ रोग की पहचान (सिम्टम्स) और उपचार, निदान। बहुत प्राचीन ग्रन्थ शंकरनिघण्टु में लिखा है- लम्बे समय से सूखी खांसी है, तो तुरन्त कफ ढ़ीला करने वाली ओषधियाँ लेवें= गले में बहुत दिनों तक कफ का बना रहना खांसी पैदा करता है। गीले कफ में तो खांसी होती ही है, लेकिन कफ के सूख जाने पर श्वास नलिकाओं-नाड़ियों में सुकड़न-संकुचन होने से सांस लेने में दिक्कत आती है। यह और भी खतरनाक हो सकता है।
कफ-कोप रोग के 16 लक्षणों को जानकर हो जाएंगे हैरान.…
स्वस्थ्य रहने के लिए कुछ मात्रा में कफ भी अत्यन्त आवश्यक है। आयुर्वेदक ग्रन्थ धन्वन्तरि, वनसेन सहिंता में वर्णन है कि-
कफ (Phlegm) के क्षय होने से अर्थात कफ सूखने या कमी रहने से शरीर में में रूखापन आने लगता है। देह में जलन का अनुभव होता है। सिर सूना, खालीपन का अनुभव होता है। कितना ही श्रम या काम करने के बाद भी ऐसा प्रतीत होता है कि आज हमने कोई काम ही नहीं किया है। इस समस्या से पीड़ित दुनिया में 31 फीसदी से भी अधिक पीड़ित पाये जाते हैं। अच्छी बात यह है कि इस तरह की परेशानी झूझने वाले अधिकांश सफल लोग ही होते हैं।
कफ सूखने या ज्यादा कमी हो जाने से देह की सन्धियाँ अर्थात जोड़ों में ढ़ीलापन आने लगता है। अकस्मात दर्द एवं चमक सी बनी रहती है। कफ क्षय वाले लोगों को प्यास अधिक लगती है अथवा पानी अधिक पीते हैं। शरीर दुर्बल, इकहरा , सुन्दर तथा आकर्षक होता है।
नींद जल्दी नहीं आती या फिर कम सोने की आदत होती है। इसलिए ध्यान देवें कि जिनकी देह ज्यादा रूखी हो, वे कफनाशक यानि कफ को सूखाने वाली अंग्रेजी दवाओं का सेवन कम ही करें। ऐसे लोगों को हमेशा रसायनिक युक्त मेडिसिन से परहेज करना हितकारी होता है। केवल देशी, घरेलू या प्राकृतिक चिकित्सा करें।
चन्द्रमा कमजोर होने से कफ खांसी
यह तकलीफ चन्द्रमा के नक्षत्र रोहिणी, हस्त एवं श्रवण में जन्मे जातकों में अधिक होने की सम्भावना रहती है। अमृतम लोजेन्ज माल्ट आयुर्वेद की एक विशेष विधि से निर्मित किया है, जो कफनाशक एवं कफवर्द्धक दोनों ही है अर्थात तन्दरुस्त देह के लिए कफ की जितनी जरूरत है उतना बनाये रखता है। यह कफ को पूरी तरह न, तो सुखाता है और न ही ज्यादा कफ निर्मित होने देता है।
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कफ रोगों का काम खत्म....अमृतम की अधिकांश ओषधियाँ हजारों साल पुराने चिकित्सा ग्रन्थों का अध्ययन, अनुसंधान करके उचित हितकारी घटक-द्रव्यों का शास्त्रमत विधि अनुसार तैयार किया जाता है।
शास्त्रों में कफ-कोप काल का भी समय बताया गया है-
कोरोना का एक कारण कफ सूखना भी है- आयुर्वेद के अनुरुप कफ का स्वरूप- सफेद, मटमैला, चिकन, घिलमिला-सा शीतल, तमोगुण युक्त और स्वाद यानि मधुर होता है, विदग्ध (पुराना, तप हुआ) होने से खारी हो जाता है। कफ नाम, स्थान और कर्म-भेदों से 5 प्रकार कहा गया है-)।
कफ के तन में रहने के स्थान...
●कफ शरीर के आमाशय में क्लेदन कफ
●ह्रदय में अवलम्बन कफ
●कण्ठ (गले) में रसन कफ
●सिर में स्नेहन कफ़ यह शरीर की सभी इंद्रियों को चिकनाई देकर तृप्त करता है। एक प्रकार से स्नेहन कफ देह में चिकनाहट यानि लुब्रिकेंट बनाये रखता है।
●संधियों अर्थात शरीर के जोड़ों में में श्लेष्मण कफ रहता है, जो सभी संधियों को जोड़कर रखता है। फ्रेक्चर होने पर श्लेष्मण कफ ही टूटी हड्डीयों को जोड़ने में मदद करता है। मतलब साफ है-जिन लोगों का कफ पूरी तरह सुख जाता है, उनकी हड्डियां कमजोर होकर चटकने लगती हैं।
इन सभी कफ के शरीर में महत्वपूर्ण कार्य भी हैं।इसकी जानकारी अगले किसी लेख में विस्तार से दी जावेगी। पढ़ते रहें अमॄतम पत्रिका
www.amrutampatrika.com
कफ-कोप के सोलह लक्षण….
【१】बिना भोजन के ही पेट भरा सा लगे।
【२】नींद, आलस्य, सुस्ती अधिक आये
【३】शरीर में अत्यधिक भारीपन हो।
【४】मुहँ का स्वाद मीठा से लगे।
【५】मुख से बार-बार पानी गिरे
【६】हर पल-हर क्षण कफ निकले
【७】ज्यादा डकार आये
【८】पखाना बहुत अधिक हो
【९】गला कफ से ल्हिसा सा मालूम हो।
【१०】भूख बहुत कम लगती हो।
【११】खाना खाते ही मन उचाट हो
【१२】मन्दाग्नि से भोजन पचता न हो।
【१३】शरीर सफेद सा होने लगे।
【१४】मल-मूत्र, नेत्रों में सफेदी आने लगे।
【१५】सदैव जाड़ा/ठंडक का एहसास हो।
【१६】गाढ़ा दस्त वह भी अधिक होता हो!
कोरोना शुष्क यानी सूखा कफ विकार है। बदलते मौसम के दौरान साल में 2 से 3 बार सर्दी जुकाम, कफ-कास, खांसी, गला रुन्धना, बार-बार छींक आना, खरास, कफ ज्यादा मात्रा में बनना आदि समस्याएं सभी के समक्ष साल में सात दिन के लिए उत्पन्न होती है। आयुर्वेदिक शरीर क्रिया विज्ञान, धन्वंतरि निघण्टु, वंगसेन सहिंता, शंकर निघण्टु में लिखा है कि- जुकाम जैसे रोग शरीर की शुद्धता के लिए बहुत जरूरी है। फेफड़ों का यह संक्रमण श्वास-नलिकाओं को साफ कर तन-मन को क्रियाशील बनाने हेतु कुदरत की एक व्यवस्था है। सर्दी-खांसी की यह तकलीफ 5 से 7 दिन तक रहकर अपने आप ठीक हो जाती है।
यह सामान्य सर्दी-जुकाम, खाँसी- हल्दी, दालचीनी, कालीमिर्च, अदरक, जीरा, मुलेठी, मुनक्का, तुलसी का काढ़ा पीने और घरेलू इलाज से ठीक हो सकता है। अंग्रेजी चिकित्सा पध्दति में एंटीबायटिक, एंटीएलर्जी, एंटीकोल्ड दवाईयां कफ को सुखाने के लिए देते हैं लेकिन ये पहले ही सूखा हुआ कफ है तो इस पर कोई फायदा नहीं होता, बल्कि आदमी अस्थमा, दमा, श्वास की परेशानियों से घिर जाता है। इम्युनिटी घटने लगती है।
स्वस्थ्य शरीर के लिए कफ ढ़ीला होकर निकलना अत्यन्त आवश्यक है। कफ कोशिकाओं नाड़ियों की गन्दगी है इसका निकलना बेहद जरूरी होता है।
आयुर्वेद ग्रन्थों में कफनाशक अर्थात कफ को नष्ट करने वाली और कफवर्धक यानि कफ को बढाने वाली दो तरह की ओषधियों का उल्लेख मिलता है।
जिन मरीजों की खांसी 7 दिन बाद भी बन्द नहीं हो रही अथवा कफ़ निकलना रुक नहीं रहा हो, उन्हें कफनाशक दवा मुफीद रहती है। ठसके वाली खांसी, जिसमें कफ नहीं निकलता, गले में दर्द एवं खराश रहती है। दमा-अस्थमा से परेशान हों ऐसे रोगियों को कफवर्द्धक यानी कफ बढ़ाने वाली दवा या काढ़ा लेना लाभकारी रहता है।
कोरोना की बीमारी में मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है, क्योंकि अधिक एलोपेथी मेडिसिन लेने से कफ पूरी तरह सुख चुका होता है। जिससे फेफड़ों या लंग्स में प्राणवायु यानि ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है। इस कारण शरीर शिथिल, निढाल होकर आलस्य, सुस्ती से घिरने लगता है। कोई काम करने की इच्छा खत्म होने लगती है और बेचैनी, घबराहट, चिड़चिड़ाहट तथा डिप्रेशन महसूस करने लगता है।
कफ कोप का काल (समय)…
# बचपन में 3 वर्ष की उम्र तक
# शीतकाल यानि ठण्ड के दिनों में।
# दिन और रात के पहले प्रहर में (अर्थात सुबह उठते ही, रात्रि में सूर्यास्त के बाद)
# भोजन करने के तुरन्त बाद।
# शीतल क्षेत्रों में रहने से
# वृद्ध अवस्था में कफ-कोप रहता है।
श्री रावण रचित ग्रन्थ-अर्कप्रकाश और मन्त्रमहोदधि में कहा गया है कि कफ काल के समय महारोग नाशक महाकाल मन्त्र
!!ॐ शम्भूतेजसे नमः!! और
!!महामृत्युंजय मन्त्र!!
की एक माला करने से कफ का दुष्प्रभाव
तुरन्त दूर हो जाता है।
कफ-कोप 10 के कारण क्या हैं…
महान आयुर्वेद वैज्ञानिक महर्षि सुश्रुत
तथा हारीत के अनुसार
[१] दिन में अधिक सोना
[२] बिना मेहनत के घर बैठे रहना
[३] अधिक आलस्य में समय व्यतीत करना
[४] मीठा-खट्टा एवं नमकीन का अधिक सेवन
[५] चावल, उड़द, अरहर की दाल, तिल आदि
[६] रात्रि में दूध-दही, चावल की खिचड़ी
[७] सूर्यास्त के बाद ईख यानी गन्ने का रस पीना
[८] जल-जीवों का माँस,
[९] सिंघाड़े, ककड़ी, अमरूद , गाजरऔऱ लताओं से उत्पन्न फल सुखिनः खाँसी में लाभकारी होते हैं लेकिन गीली, कफ वाले कास में नुकसान पहुंचते हैं।
[१०] शीतल यानि ठंडे, चिकने यानि अधिक तेल या घी युक्त, बर्फमलाई, मख्खन, भारी, अभिष्यंदी अर्थात रिसनेवाला, रेचक पदार्थो का अधिक उपयोग करना। कायम चूर्ण जैसे दस्तावर, रेचक एवं पेट साफ करने वाले सभी उत्पादों का अधिक मात्रा में सेवन करना कफ पीड़ितों को अत्यधिक हानिकारक बताया है। आँखों के रोग मोतियाबिंद को अभिष्यंद
कहा जाता है।
कफ को सन्तुलित-सम कैसे करें….
अमॄतम फार्मास्युटिकल्स, ग्वालियर द्वारा बनाये गए लोजेन्ज माल्ट का नियमित सेवन देह में विषम कफ की मात्रा को सम बनाने में सहायक है।
लोजेन्ज माल्ट (LOZENGE malt)
गीले-ढ़ीले कफ को गाढ़ा कर बाहर निकालता है और सूखी खांसी या कफ से पीड़ित मरीज की आंतों और फेफड़ों में जमे या चिपके कफ को ढ़ीला कर मल विजर्सन द्वारा साफ कर देता है।
तन में आवश्यकता अनुसार कफ की मात्रा
बनाये रखने में लोजेन्ज माल्ट अत्यन्त कारगर ओषधि है। यह श्वांस नलिकाओं को कांच सा चमका देता है। तीन माह तक निरन्तर लेने से शरीर का कायाकल्प कर देता है।
कफवर्धक पदार्थो की सूची (लिस्ट)
कफवर्द्धक का अर्थ होता है कफ को बढ़ाना।
जिन लोगों को कफ ज्यादा बनता हो या निकलता हो, उन्हें तत्काल नीचे लिखी
चीजों का इस्तेमाल रोक देना चाहिए-
@ घी, दूध, लस्सी, पनीर, दही, अंडा रात्रि में अधिक लेने से कफ की वृद्धि करते हैं।
@ कच्चे आलू, तुअर, उडद की दाल।
@ अरबी, शकरकन्दी, फूलगोभी, बंदगोभी, शिमला मिर्च, टमाटर आदि गीली खांसी वालो को नहीं लेना चाहिए।
@ सुबह खाली पेट संतरा, सेब, केला, ग्लूकोज, फेफड़ों में कफ की वृद्धि करते हैं।
@ खाने और सोकर उठने के बाद चाय के साथ बिस्कुट, ब्रेड तथा नमकीन न लेवें।
@ गर्म के साथ ठंडा और ठन्डे के साथ गर्म चीजों के खाने में 2 से 3 घण्टे का
अन्तराल (गेप) रखें।
निम्नलिखित वस्तुएं कफनाशक अर्थात कफ को सुखाती हैं, इन्हें अधिक लेने से जोड़ों में लुब्रीकेंट या ग्रीस सूखने लगता है। मधुमेह, हृदय रोगी, कोलेस्ट्रॉल और बीपी हाई से परेशान तथा नेत्र रोगियों को बहुत कम क्वान्टिटी में ही लेना चाहिए।
◆ नीम, हल्दी, तुलसी, काली मिर्च।
◆ शिलाजीत, मुलेहठी, आमलकी रसायन,
◆ अदरक, अधिक मूंग की दाल लेने से कफ सूखने लगता है।
◆ जौ की रोटी, घीया, तोरई, जीरा, चीकू, सेंधा नमक, मीठा अनार, नारियल पानी। इन पदार्थों को आयुर्वेदिक ग्रन्थ निघण्टु में कफ को बांधने वाला बताया है।
कैसे करें कोरोना वायरस की चिकित्सा…
यह घरेलू उपाय इम्युनिटी बढ़ाने तथा
कफ को सामान्य कर सभी संक्रमणों
को जड़ से मिटा देता है तथा तन पूर्णतः निरोगी हो जाता है।
छोटी हरड़, मुनक्का दोनों 8-8 नग त्रिकटु, वासा अडूसा, हंसराज, जीरा, अजवायन, सौंफ, कालीमिर्ची, सेंधानमक, धनिया, गिलोय, तुलसी, दालचीनी, सौंठ, कायफल, आंवला, काकड़ासिंगी, नागरमोथा, अतीस तेजपात, इलायची और मुलेठी सभी 1-1 ग्राम लेेकर करीब 400 ML पानी में गलाकर 24 घण्टे बाद इतना उबाले कि करीब लगभग 100 ग्राम काढ़ा रह जाये। फिर इसमें 25 ग्राम गुड़ डालकर कुछ देर तक और गर्म करके छान लेवें। यह खुराक परिवार के सभी सदस्यों को 2 से 3 चम्मच सुबह खाली पेट और रात में खाने से पहले लेवें।
दिन में तीन बार 1 से 2 चम्मच दूध के साथ लोजेन्ज माल्ट सेवन करें
क्वारेंटाईन काल में वेद-पुराणों का स्वाध्याय कर स्वास्थ्य पर ध्यान देवें ऐसा न हो कि हमारी लापरवाही किसी लफड़े में डाल दे।अब पछताय होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत।
जिंदादिली से जीने का एक फ्री का फंडा यह भी है! कभी आजमाकर देखें-
शरीर की अपनी भाषा है। दिव्य ओषधियों के साथ-साथ बड़ा दिल रखने से स्वस्थ्य रहना सम्भव है। पीछे की और लौटकर अपने स्मृति पटल पर पुरानी बातें लाने से प्रतिक्रमण प्रक्रिया पीड़ित होने लगती है। तनाव का मूल कारण पूर्व की घटनाएं होती हैं। यही रोगों की उत्पत्ति में सहायक है-
छोड़िए गठरी अतीत की…. इसलिए कम पढ़े-लिखे पुराने लोग कहते थे बीतीं ताहिं बिसार दे, आगे की सुधि लेय। जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देय॥ ताही में चित देइ, बात जोई बनि आवै। दुर्जन हंसे न कोइ, चित्त मैं खता न पावै॥ कह ‘गिरिधर कविराय’,
यहै करु मन परतीती। आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती॥
अर्थात-
पुरानी यादों को भूलकर आगे बढ़ने का प्रयास प्रत्येक पुरुष के लिए प्रथम कार्य है, जो बीत गया-सो रीत गया उसे फॉर्मेट कर आगे की सोचो। वर्तमान में जो कार्य प्रसन्न मन और सरलतापूर्वक करेंगे, तो जग-हँसाई से बचकर अपने कार्य को संपन्न कर पाओगे। इसलिए गिरिधर कविराय कहते हैं कि बस आगे का देखो, पीछे जो गया उसे बीत जाने दो।
कफ के प्रकार…लक्षण
कफ ज्वर में बदन जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। सफेद फुंसी हो सकती हैं। कभी सर्दी, कभी गर्मी लगना, बार-बार रोयें खड़े होना। जी मिचलाना, निरन्तर जुकाम, नाक से पानी बहना, देह में भयंकर पीड़ा होना आदि। कोरोना संक्रमण के लक्षण कफ ज्वार से बहुत मेल खाते हैं।
वात-पित्त ज्वर के लक्षण..
प्यास अधिक लगना, आंखों के समक्ष अंधेरा छह जाना, जोड़ों में असहनीय दर्द होना, नींद न आना
वात-कफ ज्वर के लक्षण…
मल-मूत्र रुक जाना जम्हाई, आलस्य आना, सिर में भयंकर दर्द रहना, शरीर में कम्पन्न, व्याकुलता, खांसने में कठोरता होना, पित्त कफ ज्वर- मुहँ में कड़वापन से लगना, बार-बार गंदा कफ आना, मुख में बदबू रहना, बेहोशी सी छाना, कण्ठ सुखना, आंखों में जलन होना, धुंधला सा दिखना, शरीर का तापमान कम, ज्यादा होना। आदि कफ रोगों के लक्षण हैं। अगले लेख में जाने- वात-पित्त-कफ, विषम हो, तो देह में अनेक तरह शारीरिक दोष पैदा होते हैं। मानसिक दोष- रज और तम, मन का दोष है। कफनाशक रस- कड़वा, कसैला और चरपरा ये तीनो रस कफ को सन्तुलित करते हैं। हल्के गर्म प्रभृति विपरीत गुण वाले द्रव्य-घटक, पदार्थों से कफ सम रहता है। शरीर फुर्तीला होकर दिमाग तेजी से काम करता है।
अपनी देह पर भी दृष्टि डालें....
लोजेन्ज माल्ट शरीर के सात आशय की मरम्मत कर उन्हें ठीक करता है। जैसे-
कफाशय
इसे कफ की थैली भी कहते हैं। कफ इसी में रहता है। यही से शरीर के जोड़ों में रस लुब्रीकेंट भेजकर जोड़ों में चिकनापन बनाये रखता है, जिससे जोड़ों में दर्द या सूजन नहीं होती। कफ की थैली सूख जाने से तन के अनेक हिस्सों का पतन होना शुरू हो जाता है।
आमाशय क्या है–
नाभि से स्तनों तक की दूरी वाला बीच का भाग अमाशय कहलाता है। अग्नाशय (पित्ताशय)
पवनाशय (वाताशय) मलाशय (पक्वाशय) मूत्राशय (वस्ति) रक्ताशय और महिलाओं के तीन अलग से हैं- दो स्तनाशय एवं एक गर्भाशय। अपने शरीर को भी समझना जरूरी है… इस ज्ञान से हम अनेकों व्याधियों से बचे रह सकते हैं।
मनुष्य के वक्षस्थल अर्थात छाती में कफाशय, इससे कुछ नीचे आमाशय है। नाभि के ऊपर बाईं तरफ (लेफ्ट साइड) में अग्नाशय (पित्ताशय) होता है। अग्नि-आशय के ऊपर तिल या क्लोम है, यही प्यास का स्थान है। इसी के नीचे की तरफ पक्वाशय यानि मलाशय स्थित है और मलाशय के नीचे मूत्राशय रहता है। जीव-तुल्य मतलब जीवित रखने के लिए रक्त (खून) का स्थान रक्ताशय, उर अर्थात छाती में है, इसे प्लीहा, तिल्ली, जिगर कहा जाता है। यह शरीर के दाहिनी तरफ (राइट साइड) में होता है। यह विषय बहुत ही विस्तारित है। हमारे शरीर में 210 सन्धि सात त्वचा 900 स्नायु 300 अस्थियां 108 मर्म बाबा नीम करोली बाबा के अनुसार जो 108 बार ॐ नमःशिवाय के जाप से सिद्ध होने लगते हैं।
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सात तरह के मैल
सात तरह की मांस कला
सप्तावस्था
सप्तधातु
सात प्रकार के विकार
700 शिराएँ
सात मानसिक सिद्धियां
सात स्वरों से शरीर का सम्बन्ध चौबीस धमनिया यही हँसने, बोलने, रोने, गाने भूख का एहसास, शब्द, रस, स्वाद का अनुभव कराती हैं।
500 मांसपेशियां
16 कण्डरा
दस छिद्र
तीन शारीरिक दोष
तीन मानसिक दोष
दो नितम्ब
भूतपंचक, पञ्चतन्मात्रा, एकादश इंद्रियां, त्रिविध अहंकार, तन के स्वरस आदि के बारे में आगे के ब्लॉग में बताया जाएगा। इसलिए कैसे भी वक्त निकालकर अमृतम पत्रिका हर हाल में पढ़ने का प्रयास करें। जीवन का सार पाने और जीवन के पार जाने के लिए स्वस्थ्य शरीर ही मूल आधार है।
पृथ्वी’ के कारण कफ दोष में स्थिरता और भारीपन और ‘जल’ के कारण तैलीय और चिकनाई वाले गुण होते हैं। यह दोष शरीर की मजबूती और इम्युनिटी क्षमता बढ़ाने में सहायक है कफ दोष का शरीर में मुख्य स्थान पेट और छाती हैं। कफ शरीर को पोषण देने के अलावा बाकी दोनों दोषों (वात और पित्त) को भी नियंत्रित करता है।
स्वास्थ्य का सम्पूर्ण शास्त्रोक्त ज्ञान पाने के लिए पढ़ें अमृतम पत्रिका।