मधु देने वाली मधुमक्खी की मेहनत और महानता!

मधु देने वाली मधुमक्खी की मेहनत और महानता!

Read time : min

मधुमक्खी मानवों से भी अधिक एक अत्यंत परिश्रमी कीड़ा है जिसकी एक विशाल जाति है। पाइलम आर्थपॉड अर्थात “सन्धित पाद” के अधीन जैविक रूप से वर्गीकृत ये कीड़े आज विद्यमान एक अत्यंत मनोहारी जीव हैं। अपने कार्य में गहरी अभिरूचि से ये मधुमक्खियां मनुष्य से महान हैं।

शहद का उत्पादन एक प्राकृतिक व्यवस्था है। शहद को बनाया नहीं जाता। यंग कुदरत का दिया हुआ अनुपम उपहार है …

  • मधु की इन्हीं सब विशेषताओं को देखते हुए amrutam ने मधु पंचामृत के नाम से एक उत्पाद प्रस्तुत किया है।
  • प्रकृति द्वारा प्रदत्त इस madhu Panchamrut में मुलेठी, पान का रस मिलाकर इसे इम्युनिटी बूस्टर बनाया है।
  • शहद के उसके मधुर स्वाद के लिए बहुत पसंद किया जाता है । इसमें कई लाभकारी गुण भी हैं । इस अनूठे आहार के “उत्पादकों” मधुमक्खी – के बारे में जानना सम्यक् होगा ।
  • मधुमक्खी “ऐपाइडिया” परिवार की होती हैं जिसमें 20,000 प्रजातियां हैं । मधुमक्खी इस परिवार में बहुसंख्यक तथा अत्यधिक मूल्यवान होती है जिसमें कार्पेन्टर तथा बाम्बल जैसी अन्य मधुमक्खियां शामिल हैं ।
  • मधु से पुरस्कृत और सजा प्राचीन मिस्र में गुणवान व्यक्तियों को शहद से पुरस्कृत किया जाता था जबकि मधुमक्खी का डंक निकम्मों के लिए दंड था।
  • मधुमक्खी एक प्राचीन फ्रांसीसी सम्राट का प्रतीक चिह्न थी। विख्यात युनानियों को इस प्रकार उपाधि मिली – सोफोकल्स “बी ऑफ ऐट्टिका” के नाम से जाना जाता था तथा प्लेटो को “ऐथेनियन बी’ की उपाधि दी गयी।
  • इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद ने कहा था कि मधुमक्खी ही एकमात्र जीवित प्राणी था जिससे खुदा ने बात की। इस प्राणी पर एक पूरा अध्याय समर्पित करके कुरान हमें मधुमक्खियों के प्रति इन प्राचीन लोगों के महान सम्मान के बारे में याद दिलाता है।
  • वह समूचे विश्व में उद्योग तथा आत्म-अनुशासन का प्रतीक हो गई हैं । संयुक्त राज्य अमेरिका में यूटाह राज्य के उपनिवेशिक मॉरमन्स ने अपने प्रतीक के रूप में फूलों से घिरा मधुछत्ता अपनाया । यह प्रतीक एकमात्र शब्द “उद्योग” द्वारा आच्छादित है। यूटाह को “मधुछत्ता राज्य” के नाम से भी जाना जाता है ।
  • शहद के उत्पादन में इस कीड़े द्वारा खर्च की जाने वाली उर्जा की मात्रा अद्भुत है!
  • ५५० मधुमक्खी कैबएक पौंड शहद बनाने के लिए लगभग 2.5 मिलियन फूलों पर बैठना पड़ता है। शायद मधुमक्खी की तरह व्यस्त दुनिया में दूसरा कोई अन्य प्राणी नहीं है।
  • भारत में मधुमक्खियों की चार जातियां पाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं :
  • १-एपिस सेरना इंडिका, २-एपिस फ्रलोरिया
  • ३-एपिस डॉर्सट्टा, ४-एपिस ट्रैगोना
  • इन जातियों में से सिर्फ एपिस सेरना को पाला जा सकता है। अन्य जातियां सामान्यतः पेड़ों के खोखलों, गुफाओं आदि में रहती हैं।
  • सभी मधुमक्खियां अपनी जाति के आधार पर एक नियमित पथ्यापथ्यनियम का अनुसरण करती हैं।
  • छत्ते में मुख्यतः दो प्रकार की निवासी मधुमक्खियां होती हैं । ये हैं गृह- मधुमक्खियां तथा क्षेत्र मधुमक्खियां!
  • नाम के अनुरूप ही गृह-मधुमक्खियां गृह-पाल होती हैं। वे छत्ते में पड़े समस्त कचरे की सफाई की उत्तरदायी होती हैं। ये नन्हीं सी जान अपने कर्तव्य के बारे में इतनी कट्टरवादी होती हैं कि छत्ते में बिना जाने-बूझे प्रवेश करने वाली किसी भी बड़े जीव जैसे चूहे, को घुसने नहीं देती। छत्ते पर आक्रमण करने वाले चूहों को सामान्यतः डंक मारकर खत्म कर दिया जाता है । इसके बाद गृह-पाल उसके बाल को हटाते हैं तथा छत्ता-गोंद से उसे सुखाते हैं। यह गोंद पेड़ों से एकत्रित किया जाता है।
  • विशिष्ट कार्यों के आधार पर गृह-मधुमक्खियों में संवातक, अंत्येष्टि प्रबंधक तथा छत्ता कामगार शामिल होते हैं। संवातक वे मधुमक्खियां होती हैं, जो प्रवेश द्वार के समीप खड़ी होती हैं तथा अपने पंख फरफराती हैं जिससे शहद के निर्माण के लिए आवश्यक गर्म हवा उत्पन्न होती है। “अंत्येष्टि प्रबंधक” नामक गृह-मधुमक्खियां छत्ते से मरी हुई मधुमक्खियों को निकालती हैं।
  • छत्ता-कामगार शहद संचित करने के लिए नए छते बनाती हैं। छत्ता-कोशिकाएं आकार में षड्भुजाकार तथा मधु-मोम से बनी होती हैं।
  • यह मोम छत्ता-कामगारों के पेट के भीतरी भाग में विद्यमान ग्रंथियों से बाहर निकालता है । मधुमक्खियां अपने पैर से मोम हटाती हैं तथा उसे छोटे-छोटे पिंडों में चबाती हैं। इन पिंडों को दुपरतीय, छः फलकीय छत्ता बनाने के काम में लाया जाता है।
  • छत्ता शहद संचित करने के लिए तथा बच्चों के लिए प्रयोग किया जाता है। हरेक छत्ता कोशिका अच्छी तरह से बनी होती है। सभी कोशिकाएं एक समान कोणों के साथ षड्भुजाकार होती हैं।
  • सिर्फ वे कोशिकाएं अपवाद हैं जो अकेले कोनों में होती हैं। जब कृत्रिम छत्ते बनाए जाते हैं तो ये माप सही होने चाहिएं । यदि माप इंच का एक अंश भी इधर-उधर है तो मधुमक्खियां उस छत्ते का प्रयोग नहीं करेंगी।
  • कोशिकाएं थोड़ी तिरछी होती हैं। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि शहद घनत्व के कारण बाहर निकल न सके। सभी छत्ता-कोशिकाएं 140° F एक तापमान तक गर्मी की प्रतिरोधी होती हैं। हरेक छत्ते के बीच तथा उसके चारों और “मधमक्खी स्थान” का रोड सिस्टम होता है। ये 0.5 सेमी से 1.0 सेमी चौड़े होते हैं।
  • मरम्मतकर्ता मधुमक्खी जैसी अन्य गृह-मधुमक्खियां पुराने छत्तों की मरम्मत का काम करती हैं। कैपर मधुमक्खियां फिर से तैयार किए गए छत्तों पर मोम फैलाती हैं।
  • इन छत्तों के निर्माण को देखकर चार्ल्स डारविन ने उद्गार व्यक्त किया था, “वह मंदबुद्धि व्यक्ति होगा जो आदि से अंत तक इतने खूबसूरत ढंग से बना गए छत्ते की उत्तम संरचना की उत्साही प्रशंसा के बिना जांच करता है।”
  • शहद सामान्यतः गर्मी के महीनों में तैयार किया जाता है! ऐसा मुख्यतः सर्दी में आहार की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है, जब पराग या मकरन्द उपलब्ध नहीं होता है ।
  • क्षेत्र मधुमक्खियां मकरन्द एकत्रित करती हैं। क्षेत्र मधुमक्खियां दो प्रकार की होती हैं । ये हैं – स्काउट तथा फारेजर । स्काउट मधुमक्खियां उन स्थानों की खोज में निकलती हैं जहां मकरन्द उपलब्ध होता है। इन स्काउटो को अच्छे मकरन्द से युक्त फूलों की तलाश में दो-तीन मील दूर तक चक्कर लगाना पड़ता है ।
  • स्काउट मधुमक्खियां स्वयं को अभिमुख करने के लिए सूर्य का प्रयोग करती हैं। छत्ते में वापस आने पर वे अन्य मधुमक्खियों को अपनी खोज नृत्य करके सूचित करती हैं । ये नृत्य सुप्रसिद्ध आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक काले वोन फ्रिच द्वारा पहली बार बताए गए थे। ये नृत्य दो प्रकार के हैं।
  • राउण्ड : यह नृत्य आहार स्रोत के नजदीक होने पर किया जाता है । इस प्रकार के नृत्य में स्काउट 30 सेकेंड तक पहले दायें तथा फिर बायें बहुत तेजी से मुड़ती हैं।
  • वैगल : यह नृत्य यह सूचित करता है कि आहार स्रोत दूर है। स्काउट अपने पेट को तेजी से हिलाते हुए थोड़ी दूर तक सीधी रेखा में आगे बढ़ती है। इसके बाद वह 360° पर बायीं ओर मुड़ती है, सीधे आगे बढ़ती है तथा इसके बाद दायीं ओर मुड़ती है। यह नृत्य पेट तथा पूंछ को लगातार हिलाते हुए किया जाता है।
  • मधुमक्खी का यह नृत्य उपलब्ध आहार की मात्रा के आधार पर जोर में भिन्न-भिन्न होता है । आहार स्रोत जितना ही अधिक होगा नृत्य उतना ही जोरदार होगा।
  • स्काउट यह भी सुनिश्चित करती है कि फॉरेजर ठीक उसी स्थान पर पहुंचे जहां मकरन्द पाया गया है। वह मकरन्द स्रोत पर अपने पेट से सुगन्ध सवित करके ऐसा करती है । वह अन्य मधुमक्खियों को मार्ग दिखाने के लिए उन्हें उस स्थान के फूलों की सुगंध भी लाकर देती है।
  • स्काउटों से आवश्यक सूचना मिलने पर फरिजर उस विशिष्ट स्थान की ओर उड़ती हैं। मकरन्द तथा पराग मिलने पर फॉरिजर स्वयं को पराग से पूरी तरह से धूसरित करती हैं। इसके बाद अपने उपांगों का प्रयोग करते हुए फॉरेजर अपने शरीर के रोमों के माध्यम से उसे शीघ्र झाड़ती हैं। पराग उनके पिछले पैरों के ऊपरी भाग में लगे वायरी बास्केटों में मिनटों में संचित हो जाता है। मकरन्द शहद-पेट में संचित होता है।
  • मधुमक्खी का पेट पिन के सिरे के आकार का होता है। छत्ते में वापस आते समय मधुमक्खी (जिसका अनुमानित भार पौंड का 1/500वां अंश होता है)
  • मधुमक्खी अपने आधे भार के बराबर मकरंद दे सकती है । अनुमानित हिसाबों से पता चलता है कि मधुमक्खी को एक अंगुश्ताना मकरन्द एकत्रित करने के लिए अपने पेट को लगभग 60 बार भरना, खाली करना तथा पुनः भरना पड़ता है। इससे स्पष्ट है कि मधुमक्खी को एक पौंड शहद प्राप्त करने के लिए लगभग 4000 मील का चक्कर लगाना पड़ता है।
  • मधुमक्खियां मकरन्द चूस करके फूलों के परागण मेंभी मदद करती हैं । फूलों से प्राप्त मकरन्द में 75% पानी तथा 20% इक्षु-शर्करा होती है। शेष तेल तथा गोंद का प्रतिशत होता है जो शहद को उसकी विशिष्ट खुशबू प्रदान करते हैं।
  • जब पुष्प प्याले से मकरन्द चूस लिया जाता है तब यह तरल पदार्थ मधुमक्खी के शहद कोश में चला जाता है। वहां मकरन्द जिहवा के मूल में पाए जाने वाले अम्ल-साव से मिलता है।
  • इस अवस्था में शहद कोश में विद्यमान एंजाइम डाइएस्टेज मधुमक्खी के आहार में पाए जाने वाली इक्ष-शर्करा को दाक्षा-शर्करा तथा फल-शर्करा में विश्लेषित करता है। इससे पतला शहद बनता है । पतला शहद मधुमक्खी के शहद कोश में से छत्ता कोशिकाओं में चला जाता है।
  • जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, छत्तों में गरम हवा संवातक मधुमक्खियों के पंखों के फड़ फड़ाहट द्वारा उत्पन्न होती है । इस प्रकार उत्पन्न गरम हवा से पानी वाष्पित हो जाता है तथा इस प्रकार “परिपक्व शहद” बनाया जाता है।
  • पर्यवेक्षकों के अनुसार किण्वासन (बूइंग) प्रक्रिया 80°-85° फां तापमान पर छत्ते के भीतर चालू रहती है। छत्ते के केन्द्र बिन्दू में तापमान 97 ° फां तक हो सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान ही मधुमक्खी की ग्रंथियों द्वारा सावित फार्मिक एसिड को शहद में मिलाया जाता है। फार्मिक एसिड एक परिरक्षक के रूप में काम करता है। छत्ते के प्रवेश द्वार पर तैनात मधुमक्खियां उत्पन्न शहद की रक्षा करती हैं। ये मधुमक्खियां दख्लंदाजों को लड़कर भगाने के लिए अपने जबड़ों, सूड़ों तथा पैरों का प्रयोग करती हैं।
  • इस प्रकार उत्पन्न शहद को सर्दियों के महीनों में आहार के लिए संचित किया जाता है। इस शहद को मधु-गोंद की एक पतली परत का प्रयोग करते हुए छत्ते में बंद कर दिया जाता है।
  • रानी मक्खी छत्ते की मुख्य निवासी होती है। वह अंडे देती है तथा उसके द्वारा अपनी कालोनी को फिर से भरती है।
  • अंडे देने के लिए रानी मक्खी कई नर मधुमक्खियों के सम्पर्क में आती है। ये नर मधुमक्वी ही छत्ते के पुरुष सदस्य होते हैं। वे कुल आबादी का लगभग 5% होते हैं।
  • प्रजनन क्रिया सम्पन्न होने के बाद नर मधुमक्खियों को छत्ते से बाहर निकाल दिया जाता है तथा वे बाद में मर जाते हैं । इसके दिए गए अंडे निषेचित तथा अनिषेचित दोनों होते हैं।
  • निषेचित अंडे मादा पैदा करते हैं जिनमें रानी मक्खी तथा नर मधुमक्खी, जिससे उसने जोड़ा पाया है, दोनों के जीन्स होते हैं । अनिषेचित अंडे से नर पैदा होते हैं जिनमें सिर्फ रानी मक्खी के जीन्स होते हैं।
  • छत्ते, जो वस्तुतः कालोनियां होती हैं, आकार में काफी भिन्न-भिन्न होते हैं । छोटी कॉलोनियां सामान्यतः फूटबाल के आकार की होती हैं। लेकिन विशाल छत्ते भी पाए जाते हैं।
  • डॉ. गुलमेथ ने आस्ट्रेलियाई झाड़ी में एक ऐसे छत्ते का पता लगाया था। छत्ता यूकेलिप्टस के एक विशाल पेड़ में पृथ्वी से 150 फूट की ऊंचाई पर स्थित था । यह छत्ता 36 फुट लम्बा तथा 21 फुट चौड़ा था तथा इसका वजन एक टन था ।
  • मधुमक्खी पालन….वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग करते हुए शहद उत्पादन के लिए मधुमक्खियों का पालन के नाम से जाना जाता है।
  • हाल के समय तक मधुमक्खीपालन यूरोप की तरह भारत में व्यवसाय नहीं था।
  • भारत में शहद सामान्यतः जंगलों में पायी जाने वाली मधुमक्खी कालोनियों से एकत्रित किया जाता था । इन मधुमक्खियों को धुएं से भगाया जाता था। उन्हें भगा देने के बाद छत्ते के पोटा भाग (अंडों तथा डिंभकों से युक्त भाग) को काट लिया जाता था । छत्ते के मधु भाग को टोकरियों में नीचे उतारा जाता था।
  • पेड़ के नीचे इंतजार कर रहे लोग मिट्टी के बर्तनों में छत्ते से शहद निचोड़ते थे। मात्रा बढ़ाने के लिए फल-रस या चाशनी (शुगर सीरप) मिलायी जाती थी
  • इस प्रक्रिया से निकाला गया शहद शुद्ध नहीं होता है। इसमें मरी हुई मधुमक्खियों, डिंभकों, पिस उठे अंडों इत्यादि के सार जैसे कई बाय पदार्थ होते हैं।
  • इस प्रकार का शहद फर्मेन्ट हो सकता है। इस प्रक्रिया का दूसरा दोष यह है कि इसमें प्रयुक्त पद्धति से मधुमक्खियों को सामान्यतः छत्ते से भगा दिया जाता है। चूंकि मकरन्द ऐसी अवधियों में सामान्यतः उपलब्ध नहीं रहता है, मधुमक्खियां सामान्यतः मर जाती हैं।
  • यदि छत्ते का ऊपरी भाग-शहद भाग यह सुनिश्चित करते हुए सावधानी से काटा जाता है कि कोई पोटा या पराग कोशिका नहीं है, तो इस विधि से काफी शुद शहद निकाला जा सकता है।
  • पनीर के कपड़े से छानने से उसमें और शुद्धता आती है। शीशे के ढक्कन से युक्त डिब्बे में छत्ते के इस भाग को धूप में रखने से छत्ते में परिवर्तन होता है। मोम पिधलेगा तथा शहद डिब्बे के अधोभाग में जमा होगा। जब वह ठंडा होता है तब मोम ऊपर आ जाता है। उसे निकाल दिया जाता है तथा इस प्रकार शुद्ध शहद तैयार हो जाता है।
  • जिन स्थानों में मधुमक्खी-पालन व्यवसाय है, उन स्थानों में मधुमक्खीपालकों के पास चुनी हुई नस्लों की मधुमक्खियां होती हैं, जो सर्दी के मौसम में स्वयं के भरण-पोषण के लिए आवश्यक शहद से अधिक शहद पैदा करती हैं ।
  • अगर छत्ते से अधिक शहद निकाल लिया जाता है जिससे मधुमक्खियों के आहार में कमी हो जाती है तो मधुमक्खियों को शरदकाल में या बसंत के प्रारंभ में चीनी का सीरप दिया जाता है।
  • बसंत के प्रारंभ में मधुमक्खियों को चीनी का सीरप खिलाना खराब मोसम तथा फूलों के विलंबित पुष्पण का संकेतक है।
  • भारत में मधुमक्खीपालन इस सदी के प्रारंभ में शुरू किया गया था। इसे 30 साल पहले एक नियमित उद्योग के रूप में संगठित किया गया जब खादी तथा ग्रामोद्योग आयोग की 1953 में स्थापना की गई। लगभग सभी मधुमक्खीपालन केन्द्रों में चल फ्रेम छत्ते का प्रयोग किया जाता है।
  • चल फ्रेम छत्ता काफी उपयोगी होता है क्योंकि इससे शहद से भरे हुए छत्तों से युक्त फ्रेमों को अन्य छत्तों को हिलाए-डुलाए बिना आसानी से निकाला जा सकता है। मधुमक्खियों को हिला-डुला दिया जाता है तथा वे अपने छत्तों में तुरंत पुनः प्रवेश कर जाती हैं । हरेक छत्तों में अनुमानतः 60,000 मधुमक्खियां रहती हैं।
  • रानी मक्खी के साथ मधुमक्खियों को सावधानी से मधुमक्खी पेटिका में छोड़ दिया जाता है छत्ते चल फ्रेमों में बंधे हुए होते हैं।
  • प्रारंभ में जब मधुमक्खियों को मधुमक्खी पेटिका में छोड़ा जाता है तो एक “रानी दरवाजा” लगाया जाता है । इससे रानी मक्खी (अन्य मधुमक्खियों के साथ) निकलकर भाग नहीं पाती है।
  • मधुमक्खियों के बस जाने के बाद उचित समय में इसे हटा दिया जाता है। जब इस अवरोध को हटा दिया जाता है तब मधुमक्खियां मकरन्द एकत्र करने के लिए बाहर जाती हैं।
  • मधुमक्खी पालन का मुख्य उद्देश्य छत्तों को क्षति पहुंचाए बिना उनसे शहद निकालना तथा मधुमक्खियों को छत्तों में वापस बसाना है। इस विधि द्वारा मधुमक्खियों को फिर से छत्ते बनाने के कार्य से छुटकारा मिल जाता है वे उस समय का मकरन्द एकत्र करने में उपयोग कर सकती हैं।
  • देश के अधिकांश भागों में शहद मार्च से मई तक एकत्र किया जाता है। अच्छे मौसम के दौरान शहद हर सप्ताह निकाला जा सकता है। यदि मकरन्द तथा पराग की कमी है तो मधुमक्खी कालोनियों में चाशनी डाली जाती है।
  • इन छत्तों से शहद एक केन्द्रापसारी मशीन से निकाला जाता है। यह मशीन छत्तों को कोई नुकसान पहुंचाए बिना शहद निकालती है।
  • छत्तों को खाली करने के बाद फिर रखा जाता है। मधुमक्खियां तुरन्त इन छत्तों में पुनः प्रवेश करती हैं, उन्हें साफ करती हैं तथा इसके बाद उन्हें पुनः भरना शुरू करती हैं।
  • सम्पूर्ण प्रक्रिया के लिए मधुमक्खियों के व्यवहार तथा मौसम में परिवर्तनों पर उनकी अनुक्रिया के बारे में अच्छी जानकारी आवश्यक है।
  • मधुमक्खियां न केवल हमें शहद देने में अपनी क्षमता के लिए बल्कि एक मूल्यवान परागण एजेंट के रूप में भी महत्वपूर्ण हैं । प्रभावी परागणकर्ता के रूप में कार्य करते हुए मधुमक्खियां कई कृषि-बागबानी फसलों की पैदावार भी बढ़ाती हैं।
  • सरसों, कुसुम्भ, सूरजमुखी, अलसी जैसे अधिकांश तिलहन सिर्फ मधुमक्खियों के माध्यम से पराग सिंचित होते हैं । सरसों में मधुमक्खी परागण के माध्यम से पैदावार में 131% की वृद्धि होती है जबकि सूरजमुखी में 675% की वृद्धि होती है।
  • बादाम, सेब, खूबानी, नाशपाती, गूजबेरी, तरबूज, संतरा, अमरूद इत्यादि जैसे फलों की फसल में भी पर्याप्त वृद्धि होती है। कॉफी तथा इलायची जैसी बागानी फसलों को भी मधुमक्खी परागण के माध्यम से सहायता मिलती है।
  • अनुमानों से पता चलता है कि एक एकड़ फसल के परागण के लिए लगभग 8-12 मधुमक्खी की आवश्यकता पड़ती है।
  • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5. 7 मिलियन कि.ग्रां. शहद पैदा होता है। यह विश्व उत्पादन के एक प्रतिशत से भी कम है जो इस समय 8,91,060 टन है। इस कम प्रतिशत का कारण रुचि का अभाव है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please note, comments must be approved before they are published

YOUR NEXT READ

Can You Use Ubtan on Sensitive Skin?

Ubtan for sensitive skin calls for fine powders, short contact time, and no scrubbing. Patch-test first to gently reduce redness and irritation.

Can You Use Aloe Vera Gel as a Makeup Primer?

Aloe vera gel as a makeup primer offers lightweight hydration. See how to layer it, prevent pilling, and pair it with the right foundation for your skin.

When Should You Use Ubtan Before Makeup?

Ubtan before makeup works best 2-3 hours ahead for most skin types; get skin-specific timing and prep tips for a smooth foundation base without irritation.

Should You Wash Your Hair Before a Festival?

Know when to wash hair before a festival: timing for oily, dry, and curly hair, plus prep for braids, blowouts, and heat styling for polished festive styling.

Can You Use Ubtan With Active Ingredients?

Use ubtan with active ingredients more carefully: space retinol, acids, and vitamin C apart, watch for irritation, and protect your skin barrier each day.

Talk to an Ayurvedic Expert!

Imbalances are unique to each person and require customised treatment plans to curb the issue from the root cause fully. Book your consultation - download our app now!

Learn all about Ayurvedic Lifestyle