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"आचार्य महाप्रज्ञ" ने खोजा कि
हम संसार में विकार रहित आते हैं
और विकार से भरकर अपना
विनाश कर लेते हैं ।
व्यक्ति हमेशा मूर्च्छा में जीता है,
इस लापरवाही के कारण तन में त्रिदोष (वात,पित्त,कफ) विषम हो जाते हैं ।
अमृतम आयुर्वेद में कफ,पित्त,वायु
की विषमता को त्रिदोष कहते हैं ।
त्रिदोष से मुक्त होने हेतु आचार्यों ने
निर्देश दिया है कि वर्तमान में जीने
का अभ्यास करना चाहिए ।
यह वही व्यक्ति जी सकता है,
जो अपने दोषों के प्रति जागरूक होता है ।
वर्तमान विज्ञान मानता है कि
त्रिदोष, शारीरिक दोषों से
रहित तन-मन में जागरूकता का
भाव उत्पन्न होता है ।
जागरूकता की सबसे बाधा है--मूर्च्छा ।
ने इसका शरीरशास्त्रीय
कारण बताते हुए लिखा है ----
अर्थात जब रक्त में दोष आता है,रक्त की अधिकता औऱ पित्त दोनों मिल जाते हैं ,
तब मोह की सारी प्रकृतियाँ प्रकट
होने लगती हैं ।
ये मुर्च्छाएँ,
तब सामने आती हैं जब पित्त का
प्रकोप औऱ रक्त की अधिकता होती है ।
मोह की जितनी प्रकृतियां हैं,
उतनी ही मुर्च्छाएँ हैं ।
जितनी वृत्तियां हैं, उतनी ही
संज्ञाएँ और आवेग हैं ।
शरीर मनोविज्ञान ने चौदह
मौलिक वृत्तियां मानी हैं ।
"मोह--कर्म" की 28 प्रकृतियां हैं ।
"पंतजलि" ने 5 वृत्तियां बतलायी हैं ।
दस संज्ञाएँ हैं ।
उन सबमें नामों में भेद हो सकता है,पर
मूल प्रकृति सबकी एक है ।
अमृतम आयुर्वेद के
वेदाचार्य बताते हैं---
1- पित्त की वृद्धि से मूर्च्छित होता हैं---
2- वात-वृद्धि से विवेक लुप्त होता है ---
3- कफ वृद्धि संज्ञा को सुप्त करता है ।
हमारी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि
हम जानते सब हैं,पर प्रयोग,अभ्यास
करते कुछ नहीं ।
दूसरी बात है -----
रुक गए,तो कुछ नहीं--
!दृढ़ निश्चय-पक्का इरादा!
जरूरी है---
"राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त"
ने अपने संस्मरणों में लिखा है---
मैंने साहित्य रचना शुरू की ।
मेरा निश्चय,दृढ़ सकंल्प था कि
मैं साहित्यकार बनूंगा,पर
मेरी कविताएं कोई छापने को
राजी न हुआ । मैंने 10 वर्षों में केवल
₹700 रुपये कमाए ।
खेती-बाड़ी,मजदूरी से घर खर्च
चलाया,लेकिन "रचनाएं"
लिखता रहा और एक दिन मेरा
नाम साहित्यकारों की सूची में आ गया ।
अभ्यास और दृढ़ निश्चय से मूर्च्छा
टूटकर जागरूकता बढ़ जाती है ।
इसी से "जिओ और जीने"
का सूत्र उपलब्ध होता है ।
अमृतम जीवन का सूत्र--
बीती ताहिं बिसार दे,
आगे की सुधि लेह ।
जो कोई भी पुराण भूलकर,
वर्तमान में जीना प्रारम्भ कर देता है,
वह अतीत के पाप की चादर
धो देता है तथा
ज्यों की त्यों धर
दीन्ही चदरिया' !
"कबीर" की इस उक्ति को सार्थक
कर देता है ।
स्वस्थ्य रहने का दूसरा उपाय यह है कि
()- मन की चंचलता को कम करें
()- स्थिरता की बढ़ाना ।
()- "वात,पित्त,कफ" यानि त्रिदोष
के प्रकोप को कम करना ।
"अमृतम आयुर्वेद के आचार्यों"
ने बताया कि रोग
मन द्वारा मस्तिष्क में औऱ
मस्तिष्क से तन में प्रवेश करते हैं ।
मन के दरवाजों के खुला रखना
दुःख का कारण है औऱ
उन्हें बन्द कर देना सुख का साधन है ।
वेदान्त में भी कहा गया है कि स्वस्थ शरीर ही
संसार का सुख औऱ मोक्ष का हेतु है ।
आज के वैज्ञानिकों की माने,
तो हमारी सारी बीमारी-वृत्तियों
का कारण बतलातें हैं----
@ग्रंथियों का स्राव ।
@जैसी सोच-वैसी लोच ।
कुंठित विचारों से
होकर शरीर की
अवयवों व कोशिकाओं
को शिथिल कर देती है ।
अच्छी सोच का प्रभाव
अनेकों दुष्प्रभाव मिटाकर
अभाव दूर करने में सहायक है ।
भाव पूर्ण विचार तथा हमारा
शुद्ध चरित्र ही सबसे बड़ा मित्र है
जो तन को इत्र की तरह महकाता है ।
सदेव स्वस्थ्य रहने के लिए
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बहुत जरूरी बात-
यह है कि अगले ब्लॉग में
"पित्त के प्रकोप"
के बारे में एक दुर्लभ जानकारी
मिलेगी ।
पित्त के बिगड़ने से कितने
असाध्य व
खतरनाक रोग होते हैं ।
आप सरल शब्दों में समझ सकेंगे ।
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